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19 वी सदी की पाट पद्धति खेती को सलाम

राजेन्द्र जोशी (विशेष संवाददाता)

19 वी सदी की पाट पद्धति खेती को सलाम

जब एक और प्रदेश और देश में चारो और महंगाई के साथ पेट्रोल,बिजली,पानी की समस्या पर आम और खास लोग आपसी चर्चा बहस,एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर रहे है,ऐसे समय में  बडवानी जिले के कई दुरस्थ आदिवासी ग्रामो के आदिवासी भाइयो को सलाम जो कि आज के आधुनिक साधनो की सुख सुविधा में लिप्त खास लोगो को पाट की खेती कर संदेश दे रहे है कि 19 वीं सदी की परम्परा और तकनीक के सहारे भी खेती की जा सकती है।

पाट पद्धति की खेती वह कहलाती है जो कि नालो के नीचे बहते पानी डाउन स्टीम को उपर अपस्टीम पर ले जाकर खेतो में सिंचाई की जाती है और वह भी बिना किसी पम्प या मोटर के सहारे,इस पद्धति में नाले के बहते पानी को नाली के माध्यम से खेतो में ले जाया जाता है।
बडवानी जिले के पाटी विकासखंड के ग्राम लिम्बी के कातर फल्या के वेलसिंग नाले के पानी को इसी पद्धति से लगभग एक किलोमीटर दूर अपने खेत पर ले गया था।

वेलसिंग को इस पाट की खेती की याद इसलिए आई कि उस पर बिजली बिल का हजारो रूपया बकाया होने के साथ ही उसके मोटर पम्प का खराब होना था,वेलसिह ने चर्चा में बताया था,कि आज से लगभग 20 साल पहले जब में ग्राम में बिजली नही थी उस समय,उसके पिता गटटू सन्डया इसी पद्धति से खेती करते थे,लेकिन बिजली आने के बाद से पाट की परम्परागत खेती बन्द हो गई थी,लेकिन बिजली बिल की मजबूरी और पाट की खेती की तकनीकी जानकारी होने के कारण उसे एक बार फिर इस पद्धति की और मोड दिया था। 
पाट पद्धति से वेलसिह अपनी लगभग ढेड बीघा जमीन पर कपास की फसल में सिंचाई कर रहां था। कुछ समय पूर्व वेलसिंग की आकस्मिक मौत ने इस परम्परागत खेती के सिपाही को खो दिया। 

तकनीकी पक्ष है यह

पाट के माध्यम से 5 से 6 किलोमीटर दूर तक के खेतो में पहुंचने वाला पानी आॅखो को धोका देता है। जिसके कारण हमें लगता है कि यह पानी नाले की सतह से उपर चढ़कर खेतो को सीच रहा है। किन्तु ऐसा है नही ..! क्योंकि जिस क्षेत्र में पाट से सिंचाई करना होती है वहाॅ के कृषक अपने खेत के पास से बहने वाले नाले के बहाव के उपर की तरफ सैकड़ोझारो मीटर दूर जाकर नाले के पानी को फावड़ा के माध्यम से नाली बनाते हुये अपने खेतो की तरफ चलते है। इस प्रक्रिया में वे पहाड़ो के उपर व मैदानो में भी बहाव का सदैव ध्यान रखते है। इस दौरान यदि मार्ग में कंदरा या गहरा स्थान आ जाये तो वे खजूर के तने को नाली के आकार में खोखला कर रखकर लेवल बनाते है। (आजकल यह कार्य प्लास्टिक के पाई से भी होने लगा है) इस प्रक्रिया में कुछ सौ मीटर दूरी पश्चात् ही मुख्य नाला हमें पाट की स्थिति से नीचा नजर आने लगता है। जो निरन्तर दूरी बढ़ने के साथ-साथ और नीचा होता चला जाता है। इस प्रकार जब पानी वांछित स्थन के खेतो तक पहुंचता है तो मुख्य नाले से कई मीटर उपर स्थित खेतो को सीचने लगता है। जिसके कारण हमें ऐसा प्रतीत होता है कि वह नाले से कई मीटर उपर के खेतो को सीच रहा है। जब कि वास्तविकता यह है कि जिस खेत में पाट का पानी आ रहा है वह पाॅट प्रारंभ किये गये स्थान से कई मीटर नीचे होता है । 
बडवानी जिले के पाटी विकासखंड के ही और कई ग्राम जैसे,पलवट,सेमली,अंजराडा सहित अन्य ग्रामो में पाट की परम्परागत सिंचाई पद्वत्ति को अपनाया जा रहां था। तो वही धार जिले की कुक्षी तहसील के ग्राम डही के आस पास के ग्रामो में भी यह सिंचाई पद्वत्ति अपनाई जाती रही है। 
 

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