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मछुआरो की आजीविका पर संकट l हमारा धंधा जुऐ और सटटे जेसा हो गया है,जिस दिन दाव लग जाये उस दिन दिवाली

मछुआरो की आजीविका पर संकट
हमारा धंधा जुऐ और सटटे जेसा हो गया हे,जिस दिन दाव लग जाये उस दिन दिवाली
(राजेंद्र जोशी विशेष संवाददाता)

बडवानी- बाबूजी हमारा धंधा अब जुऐ और सटटे जेसा हो गया हे,जिस दिन दाव लग जाये उस दिन दिवाली,क्यों की नदी में पानी इतना ज्यादा हे की आप मछली पकड़ने के लिये पूरा दिन भी लगा दो,तो कम लगता हे,पहले पानी कम था,मछलिया ज्यादा थी,आज पानी ज्यादा हे,मछलिया कम हो गई,उसपर ओजार (मछली पकड़ने के जाल को ओजार कहते हे) का भी बहुत नुक्सान होता हे |
यह कहना था बिजासन के राधेश्याम पिता तुकाराम कहार का,हम तुकाराम के साथ उसी नाव में सवार थे जिस पर वह प्रतिदिन मछली पकड़ने बिजासन से भवती.अवल्दा तक आते हे,राधेश्याम नर्मदा जी के इस किनारे से उस किनारे याने धार जिले के निसरपुर वाले किनारे तक मछली पकड़ने की जाल बिछाता हे,और सुबह 05 बजे से दोपहर तक झाकर चलाकर(मछली की जाल को देखना) जाल में फसी मछलियों को देखता हे,किसी दिन 10 किलो तो किसी दिन एक किलो और किसी किसी दिन खाली हाथ भी लोटना पड़ता हे,यह कहते कहते तुकाराम बोला बाबूजी एक मछली हे,लेकिन यह क्या मछली मरी हुई निकली,

उसे फेंककर वह फिर जाल चलाने लगा,हम नर्मदा नदी में राधेश्याम के साथ 4 घंटे तक रहे और उसे बमुश्किल 1 मछली भी नही मिल पाई,हा इस दोरान रंगबिरंगे पक्षी जरुर नजर और की सालो के बाद तितर भी दिखाई दिया |
दूर दूर तक नर्मदा नदी का विशाल पाट सन्नाटे को चीरती और आगे बढती नाव के साथ नदी के बीच में आ रही झाड़िया हलचल पैदा कर रही थी,तुकाराम के बेटे जीतेन्द्र ने बातो का सिलसिला बढ़ाते हुये बताया की उसके पिता ने यह नाव अलंग (गुजरात) से पुरानी खरीदी हे,और मंडलेश्वर से पुराना इंजन ख़रीदा,नाव लगभग ढेड लाख रुपये में तेयार हो गई हे, प्रतिदिन सो रूपये का डीजल लगता हे मछली पकड़ने के लिये |


पानी ज्यादा होने से कम हुई मछलिया और प्रजातिया —- नर्मदा नदी में पानी ज्यादा होने के कारण मछलिया कम हो गई हे,राधेश्याम ने बताया की इसके दो कारण हे,पहला – मछलिया उथले और बहते पानी में रहना पसंद करती हे,नम्बर दो- मछलिया गंदे पानी में उपर नही आती हे वह नीचे की सतह पर रहती हे | पहले नर्मदा नदी में लगभग 40 से 50 प्रजाति की मछलिया होती थी,अब मुश्किल से 4 से 5 प्रकार की मछलिया पकड में आ रही हे,उसमे भी पसंदीदा पारन,बाम और गेगरे जेसे मछलिया दिखाई नही पड रही |
मछलिया उपर की और चली गई – राधेश्याम के पुत्र जितेन्द्र ने बताया की मछलिया बहते पानी में प्रजनन करती हे, अंजड,बडवानी से लगाकर भादल तक नर्मदा का पानी ठहरा हुआ हे यानी पानी बह नही रहा इसके चलते भी मछलिया कम हो गई हे |
मछलिया पानी को शुद्ध करती हे—जितेन्द्र ने बताया की नदी के पानी को शुद्ध और साफ रखने में मछलियों का बड़ा योगदान हे,कुछ मछलिया तल में रहकर काई खाती हे,कुछ कचरा खाती हे कुछ किट खाती हे जिसके चलते नदी का सतुलन बना रहता हे,वर्तमान में पेडो और खेतो के डूबने के साथ पानी ठहर गया,और गंदा हो गया हे |
महंगा हो गया मछली पकड़ना – राधेश्याम ने बताया की पहले कम पानी था तो चप्पू से चलाने वाली नाव से काम चल जाता था,लेकिन अब पानी ज्यादा हो गया हे,जोखीम बढ़ गया हे,बिना इंजन वाली नाव से आने में डर लगता हे,रोज 100 रूपये का डीजल लगता हे,एक मछली की जाल 20 हजार के आस पास पडती हे,उस जाल में 500 रूपये किलो की 30 किलो जाल और 200 रूपये किलो की 15 किलो रस्सी लगती हे,तब जाकर नदी के एक किनारे से दुसरे किनारे तक जाल पंहुचता हे,और कभी कभी हमारे ओजार(जाल) का नुकसान भी हो जाता हे,झाड़ियो में अटक कर फट जाता हे |

न घर बचा न धंधा — राधेश्याम और जितेन्द्र साथ में बताते हे की,उनका परिवार पीढियों से नर्मदा नदी के किनारे मछली पकड़ने और खरबूजे की खेती करता आ रहा हे,नदी में पानी बढ़ जाने से खरबूजे की खेती तो पहले ही बर्बाद हो गई और अब मछलिया भी नही मिल रही,घर डूब में आ गया हे,सरकारी शरण में रह रहे हे और उनके दवारा दिए गये भोजन पर आश्रित हे,सरकार की पुनर्वास नीति में मछुआरो के लिये प्रावधान होने के बाद भी दलालों से घिरे नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण विभाग ने आज तक इनके लिये कुछ नही किया |

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